राज्यसभा: संरचना, निर्वाचन, शक्तियाँ और लोकसभा से तुलना
राज्यसभा, जिसे Council of States (राज्यों की परिषद) के नाम से भी जाना जाता है, भारतीय संसद का उच्च सदन है। यह राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों का प्रतिनिधित्व करती है और भारत की संघीय व्यवस्था को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। राज्यसभा की व्यवस्था द्विसदनीयता (Bicameralism) और संघवाद (Federalism) के सिद्धांतों पर आधारित है। यह राज्यों को संघ स्तर पर प्रतिनिधित्व प्रदान करती है और संसद के संवैधानिक दूसरे सदन के रूप में कार्य करती है। लोकसभा के विपरीत, राज्यसभा एक स्थायी सदन है और इसे भंग नहीं किया जा सकता।
राज्यसभा की संरचना
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 80 के तहत राज्यसभा की अधिकतम सदस्य संख्या 250 निर्धारित की गई है। इनमें अधिकतम 238 सदस्य राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों का प्रतिनिधित्व करते हैं, जबकि 12 सदस्यों को भारत के राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत किया जाता है। मनोनीत सदस्य ऐसे व्यक्तियों में से चुने जाते हैं जिन्हें साहित्य, विज्ञान, कला और समाज सेवा जैसे क्षेत्रों में विशेष ज्ञान या व्यावहारिक अनुभव प्राप्त हो। राज्यसभा की वास्तविक सदस्य संख्या संवैधानिक और वैधानिक प्रावधानों के अनुसार समय-समय पर निर्धारित होती है।
राज्यसभा के सदस्यों का निर्वाचन
राज्यों का प्रतिनिधित्व करने वाले सदस्यों का निर्वाचन संबंधित राज्यों की विधानसभा के निर्वाचित सदस्यों द्वारा अप्रत्यक्ष रूप से किया जाता है। यह निर्वाचन आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली (Proportional Representation) के अंतर्गत एकल संक्रमणीय मत (Single Transferable Vote – STV) प्रणाली द्वारा होता है। राज्यसभा के चुनाव में खुले मतपत्र (Open Ballot) की व्यवस्था लागू है, जिसे 2003 में जनप्रतिनिधित्व अधिनियम में संशोधन के माध्यम से लागू किया गया था। कुछ केंद्र शासित प्रदेशों के प्रतिनिधियों का निर्वाचन संबंधित कानून के अनुसार गठित निर्वाचक मंडल (Electoral College) द्वारा किया जाता है। इसके अतिरिक्त, राष्ट्रपति 12 सदस्यों को उनके विशेष ज्ञान या व्यावहारिक अनुभव के आधार पर मनोनीत करते हैं।
राज्यसभा एक स्थायी सदन
राज्यसभा एक स्थायी सदन है और इसे भंग नहीं किया जा सकता। संविधान का अनुच्छेद 83(1) राज्यसभा के स्थायी स्वरूप का प्रावधान करता है। हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि इसके सदस्य हमेशा के लिए पद पर बने रहते हैं। प्रत्येक सदस्य का सामान्य कार्यकाल छह वर्ष होता है और लगभग एक-तिहाई सदस्य प्रत्येक दो वर्ष में सेवानिवृत्त होते हैं। इस व्यवस्था के कारण राज्यसभा में निरंतरता बनी रहती है और पूरा सदन एक साथ परिवर्तित नहीं होता।
राज्यसभा की शक्तियाँ
राज्यसभा को विभिन्न प्रकार की विधायी, संवैधानिक, विचार-विमर्श संबंधी और संघीय शक्तियाँ प्राप्त हैं। सामान्य विधायी मामलों में किसी विधेयक को कानून बनने के लिए सामान्यतः संसद के दोनों सदनों की स्वीकृति आवश्यक होती है। राज्यसभा सामान्य विधेयकों पर चर्चा कर सकती है, उनमें संशोधन प्रस्तावित कर सकती है और उन्हें पारित कर सकती है। यह संविधान संशोधन से संबंधित विधायी प्रक्रिया में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इसके अतिरिक्त, संविधान में निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार कुछ संवैधानिक पदाधिकारियों के महाभियोग या पद से हटाने की कार्यवाही में भी राज्यसभा की भूमिका होती है।
राज्यसभा के पास कुछ विशेष शक्तियाँ भी हैं, जो इसे लोकसभा से अलग बनाती हैं। अनुच्छेद 249 के तहत राज्यसभा संसद को राष्ट्रीय हित में राज्य सूची के किसी विषय पर कानून बनाने के लिए अधिकृत कर सकती है। इसके लिए उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के कम से कम दो-तिहाई बहुमत से प्रस्ताव पारित होना आवश्यक है। इसी प्रकार, अनुच्छेद 312 के तहत राज्यसभा संसद को संघ और राज्यों के लिए एक या अधिक अखिल भारतीय सेवाओं (All India Services) के गठन के लिए अधिकृत कर सकती है। इसके लिए भी उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के कम से कम दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता होती है।
राज्यसभा और धन विधेयक
धन विधेयक (Money Bill) के संबंध में राज्यसभा की भूमिका सीमित है। अनुच्छेद 110 के अनुसार धन विधेयक केवल लोकसभा में ही प्रस्तुत किया जा सकता है और इसे राज्यसभा में प्रस्तुत नहीं किया जा सकता। लोकसभा द्वारा धन विधेयक पारित किए जाने के बाद इसे राज्यसभा के पास उसकी सिफारिशों के लिए भेजा जाता है। राज्यसभा को धन विधेयक को 14 दिनों के भीतर लोकसभा को वापस करना होता है।
लोकसभा राज्यसभा द्वारा की गई किसी भी या सभी सिफारिशों को स्वीकार या अस्वीकार कर सकती है। यदि राज्यसभा 14 दिनों के भीतर धन विधेयक वापस नहीं करती है, तो वह विधेयक उसी रूप में दोनों सदनों द्वारा पारित माना जाता है, जिस रूप में उसे लोकसभा ने पारित किया था।
राज्यसभा के पीठासीन अधिकारी
भारत के उपराष्ट्रपति राज्यसभा के पदेन सभापति (Ex-officio Chairman) होते हैं। संविधान के अनुच्छेद 64 के अनुसार उपराष्ट्रपति राज्यसभा के सभापति के रूप में कार्य करते हैं। सभापति सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता करते हैं और संविधान तथा राज्यसभा के नियमों के अनुसार अपने कर्तव्यों का निर्वहन करते हैं।
राज्यसभा अपने सदस्यों में से एक उपसभापति (Deputy Chairman) का निर्वाचन भी करती है। जब सभापति का पद रिक्त हो या सभापति अपने कर्तव्यों का निर्वहन करने में असमर्थ हों, तब उपसभापति उनके कार्यों का निर्वहन करता है।
राज्यसभा सदस्य बनने की न्यूनतम आयु
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 84(ख) के अनुसार राज्यसभा का सदस्य बनने के लिए व्यक्ति की न्यूनतम आयु 30 वर्ष होनी चाहिए। यह लोकसभा सदस्य बनने की न्यूनतम आयु से अधिक है। लोकसभा के लिए न्यूनतम आयु 25 वर्ष है। राज्यसभा के लिए अधिक आयु की आवश्यकता का उद्देश्य उच्च सदन में अधिक अनुभव और परिपक्व विचार-विमर्श को बढ़ावा देना माना जाता है।
राज्यसभा और लोकसभा में प्रमुख अंतर
राज्यसभा और लोकसभा मिलकर भारतीय संसद का गठन करते हैं, लेकिन उनकी संरचना, निर्वाचन प्रक्रिया, कार्यकाल और शक्तियों में महत्वपूर्ण अंतर हैं। राज्यसभा संसद का उच्च सदन और स्थायी सदन है, जबकि लोकसभा निचला सदन है और इसे इसके सामान्य पांच वर्षीय कार्यकाल की समाप्ति से पहले भी भंग किया जा सकता है।
राज्यसभा में राज्यों का प्रतिनिधित्व करने वाले सदस्यों का निर्वाचन राज्य विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्यों द्वारा अप्रत्यक्ष रूप से किया जाता है, जबकि लोकसभा के सदस्य सामान्यतः जनता द्वारा प्रत्यक्ष निर्वाचन के माध्यम से चुने जाते हैं। राज्यसभा सदस्य बनने की न्यूनतम आयु 30 वर्ष है, जबकि लोकसभा सदस्य बनने के लिए न्यूनतम आयु 25 वर्ष है।
वित्तीय विधेयकों के संबंध में भी दोनों सदनों की शक्तियाँ अलग-अलग हैं। धन विधेयक केवल लोकसभा में प्रस्तुत किया जा सकता है और राज्यसभा उस पर केवल सिफारिशें कर सकती है। दूसरी ओर, राज्यसभा को संघीय व्यवस्था से संबंधित महत्वपूर्ण विशेष शक्तियाँ प्राप्त हैं, विशेष रूप से अनुच्छेद 249 और अनुच्छेद 312 के अंतर्गत। ये शक्तियाँ राष्ट्रीय हित तथा अखिल भारतीय सेवाओं से जुड़े महत्वपूर्ण मामलों में राज्यसभा की भूमिका को मजबूत बनाती हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
राज्यसभा की अधिकतम सदस्य संख्या कितनी है?
संविधान के अनुसार राज्यसभा की अधिकतम सदस्य संख्या 250 है। इनमें अधिकतम 238 सदस्य राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों का प्रतिनिधित्व करते हैं, जबकि 12 सदस्यों को राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत किया जाता है। वास्तविक सदस्य संख्या संवैधानिक अधिकतम सीमा से कम हो सकती है।
राज्यसभा के सदस्यों का निर्वाचन कैसे होता है?
राज्यों का प्रतिनिधित्व करने वाले सदस्यों का निर्वाचन संबंधित राज्य विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्यों द्वारा किया जाता है। निर्वाचन आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के तहत एकल संक्रमणीय मत (STV) प्रणाली से होता है। राज्यसभा चुनावों में खुले मतपत्र की व्यवस्था है। कुछ केंद्र शासित प्रदेशों के सदस्यों का निर्वाचन संबंधित कानून के अनुसार निर्वाचक मंडल द्वारा किया जाता है, जबकि 12 सदस्यों को राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत किया जाता है।
क्या राज्यसभा एक स्थायी सदन है?
हाँ। राज्यसभा संसद का स्थायी सदन है और इसे भंग नहीं किया जा सकता। इसके प्रत्येक सदस्य का सामान्य कार्यकाल छह वर्ष होता है और लगभग एक-तिहाई सदस्य प्रत्येक दो वर्ष में सेवानिवृत्त होते हैं। इससे सदन के कामकाज में निरंतरता बनी रहती है।
क्या राज्यसभा धन विधेयक को अस्वीकार कर सकती है?
नहीं। राज्यसभा धन विधेयक को सामान्य विधेयक की तरह अस्वीकार या संशोधित नहीं कर सकती। वह धन विधेयक पर अपनी सिफारिशें दे सकती है और उसे 14 दिनों के भीतर लोकसभा को वापस करना होता है। लोकसभा राज्यसभा की सिफारिशों को स्वीकार या अस्वीकार कर सकती है। यदि राज्यसभा 14 दिनों के भीतर विधेयक वापस नहीं करती है, तो वह लोकसभा द्वारा पारित मूल रूप में दोनों सदनों द्वारा पारित माना जाता है।
राज्यसभा की विशेष शक्तियाँ क्या हैं?
राज्यसभा के पास दो महत्वपूर्ण विशेष शक्तियाँ हैं। अनुच्छेद 249 के तहत यह राष्ट्रीय हित में संसद को राज्य सूची के किसी विषय पर कानून बनाने के लिए अधिकृत कर सकती है। अनुच्छेद 312 के तहत यह संसद को एक या अधिक नई अखिल भारतीय सेवाओं के गठन के लिए अधिकृत कर सकती है। दोनों मामलों में प्रस्ताव को उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के कम से कम दो-तिहाई बहुमत से पारित होना आवश्यक है।
राज्यसभा की अध्यक्षता कौन करता है?
भारत के उपराष्ट्रपति राज्यसभा के पदेन सभापति होते हैं। राज्यसभा अपने सदस्यों में से एक उपसभापति का भी निर्वाचन करती है, जो आवश्यकता पड़ने पर सभापति के कार्यों का निर्वहन करता है।
राज्यसभा का सदस्य बनने की न्यूनतम आयु कितनी है?
राज्यसभा का सदस्य बनने के लिए न्यूनतम आयु 30 वर्ष है। यह प्रावधान संविधान के अनुच्छेद 84(ख) में दिया गया है। इसके विपरीत, लोकसभा सदस्य बनने की न्यूनतम आयु 25 वर्ष है।
निष्कर्ष
राज्यसभा भारत की संसदीय लोकतांत्रिक और संघीय व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण अंग है। राज्यों का प्रतिनिधित्व करने और संसद में निरंतरता बनाए रखने के कारण यह एक महत्वपूर्ण संवैधानिक संस्था के रूप में कार्य करती है। यह विधायी मामलों पर विस्तृत विचार-विमर्श के लिए एक महत्वपूर्ण मंच प्रदान करती है और संसद में एक आवश्यक संवैधानिक संतुलन बनाए रखने में योगदान देती है।
यद्यपि वित्तीय मामलों में लोकसभा को अधिक अधिकार प्राप्त हैं और लोकसभा जनता का प्रत्यक्ष प्रतिनिधित्व करती है, लेकिन राज्यसभा को राज्यों के प्रतिनिधित्व तथा अनुच्छेद 249 और 312 के अंतर्गत प्राप्त विशेष संवैधानिक शक्तियों के कारण एक विशिष्ट भूमिका प्राप्त है। दोनों सदन मिलकर भारत की द्विसदनीय संसदीय व्यवस्था, संघवाद और संवैधानिक शासन प्रणाली की मजबूत नींव तैयार करते हैं।